यह महामारी डब्ल्यूएचओ में सुधार का एक मौका भी है

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यह महामारी डब्ल्यूएचओ में सुधार का एक मौका भी है 

Current Affairs के आज का आलेख में आपका स्वागत है. यह पोस्ट आपके तैयारी को एक नया आयाम देगा जो आपको  MPPSC, JSSC, JPSC, BPSC, UPSC  आदि Exam के लिए सहायक होगा.
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COVID-19


यह महामारी डब्ल्यूएचओ में सुधार का एक मौका भी है 

 कोविड-19 की व्यापकता ने सार्वजनिक स्वास्थ्य के मामले में मजबूत वैश्विक सहयोग की जरूरत बताई है। यह सहयोग क्षेत्रीय स्तर पर भी जरूरी है और बहुपक्षीय स्तर पर भी। जी-20 के देशों ने बीते 26 मार्च को अपने वीडियो सम्मेलन में सूचनाओं के आदान-प्रदान को बेहतर बनाने और आपसी सहयोग बढ़ाने का । फैसला किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन, यानी सार्क के सदस्य देशों को कोविड-19 पर आपसी सहयोग बढ़ाने का आह्वान किया था। जी-20 की बैठक में विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ में सुधार की आवश्यकता पर भी चर्चा हुई। यह पहल महत्वपूर्ण बात है, क्योंकि सार्वजनिक स्वास्थ्य के मामले में डब्ल्यूएचओ दुनिया की सबसे बड़ी संस्था है और संयुक्त राष्ट्र के अधीन है। इसकी ढांचागत व्यवस्था ऐसी होनी ही चाहिए कि सार्वजनिक स्वास्थ्य में वैश्विक सहयोग को वह मजबूती से आगे बढ़ाए और जरूरत के वक्त विकासशील देशों की पर्याप्त मदद करे। आज से पहले दुनिया पर जो आखिरी संकट आया था, वह 2008 की वित्तीय मंदी थी। उस समय, जी-20 में प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं एक साथ आई थीं। लिहाजा, इस समय भी बड़े देशों को कुछ ठोस करना चाहिए। जब वैश्विक स्तर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य की आपात स्थिति की घोषणा होती है, तो वह दुनिया के तमाम लोगों से जुड़ी होती है। इसीलिए विकासशील देशों की आवाज भी निर्णय-प्रक्रिया में शामिल की जानी चाहिए। डब्ल्यूएचओ एक अंतर-सरकारी संस्था है और वैश्विक ताकतवर देशों के दबावों से मुक्त नहीं है। कुछ रिपोर्ट बताती हैं कि किस तरह इसके । महानिदेशक ने इस वायरस के जनक देश (चीन) के नाम पर कोरोना का नाम रखने से कन्नी काटी और इसे महामारी घोषित करने में देरी की। डब्ल्यूएचओ के बजट का केवल एक चौथाई हिस्सा संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों से आता है। इसका काम तो उन देशों और संस्थाओं से आने वाले पैसों से चलता है, जो इसमें स्वैच्छिक योगदान करते हैं। एक वैश्विक संयोजक के रूप में डब्ल्यूएचओ सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण मानक तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लिहाजा इसका आर्थिक रूप से ताकतवर देशों, खासकर दवा उद्योग में दबदबा रखने वाले देशों के वशमें होना काफी अहम मसला है। इस संगठन को सबसे ज्यादा योगदान अमेरिका देता है, लेकिन चीन ने भी इसके महत्व को पहचाना है। और पिछले महानिदेशक तो उसी द्वारा नामित व्यक्ति थे। इस संगठन में फैसले लेने वाली इकाई हर साल आयोजित होने वाली विश्व स्वास्थ्य सभा (डब्ल्यूएचए) है। इसमें सभी सदस्य देश शामिल होते हैं। इसका एक कार्यकारी बोर्ड भी है, जिसके सदस्य | भौगोलिक प्रतिनिधित्व के आधार पर 34 देशों से चुने गए तकनीकी रूप से सक्षम व्यक्ति होते हैं। जब आज इस संगठन द्वारा वक्त पर जरूरी कार्रवाई की मांग की जा रही है, तो इसके कार्यकारी बोर्ड को एक स्टैंडिंग बॉडी बनानी चाहिए, जिसमें चयनित देशों को जिनेवा-आधारित स्थाई प्रतिनिधित्व मिले। एक ऐसी व्यवस्था बननी चाहिए कि जरूरत पड़ने पर कार्यकारी बोर्ड के सदस्यगण आपस में मिल-बैठ सकें और जरूरी कार्रवाई के निर्देश दे सकें। कार्यकारी बोर्ड को सिर्फ भौगोलिक प्रतिनिधित्व से परे जाने की जरूरत है। उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और ज्यादा आबादी वाले देश भी इसके प्रमुख साझीदार बनें। संयुक्त राष्ट्र में ही संयुक्त राष्ट्र महिला बोर्ड की संरचना एक मिसाल है, जो विभिन्न क्षेत्रों से प्रतिनिधित्व चुनने के अलावा बड़े दाताओं को भी प्रतिनिधित्व देता है। दवा एवं चिकित्सा विज्ञान में उभरने वाले मसलों के कारण भी डब्ल्यूएचओ में सुधार की जरूरत है। यह एक बड़ा और आकर्षक उद्योग है, जिसमें बौद्धिक संपदा अधिकार को सबसे ऊपर माना जाता है, पर मुश्किल यह है कि संकट के समय में इसमें सहयोगपूर्ण शोध की कम इच्छा दिखती है। न डब्ल्यूएचओ, और न कोई बहुपक्षीय संगठन दवा से जुड़े शोध में शामिल हैं। उन्हें नई दवा के निर्माण कार्य में शामिल किया जाना चाहिए। खरीदने या वहन करने योग्य इसकी क्षमता भी मौजूं पहलू है, जिस मामले में डब्ल्यूएचओ का रिकॉर्ड अच्छा नहीं है। जाहिर है, मौजूदा संकट एक ऐसा अवसर है, जब डब्ल्यूएचओ में सुधार के लिए जरूरी उपाय किए जा सकते हैं। (ये blogger के अपने विचार हैं)
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Save Lives

स्वस्थ पृथ्वी ही करेगी हमारी सुरक्षा

A लेखक भारत के उप-राष्ट्रपति हैं

इस वर्ष विश्व आरोग्य दिवस का पड़ाव ऐसे वक्त पर आया है जब पूरी दुनिया उस कोविड-19 महामारी के खिलाफ संघर्ष कर रही है जो अब तक हजारों जिंदगियां लील चुकी है। यह समय मानव जाति को यह स्मरण कराने का है कि वह न केवल अपने स्तर पर स्वच्छता का ख्याल रखे, बल्कि प्रकृति और उसके पारिस्थितिकी तंत्र के साथ कोई खिलवाड़ न करे। यह सभी स्वास्थ्यकर्मियों के योगदान को सम्मान देने का भी समय है जो कोविड-19 से जूझ रहे मरीजों की देखभाल में लगे हैं, खासतौर से नर्से जिन पर इस वर्ष डब्ल्यूएचओ ने विशेष फोकस किया है।
 

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CORONA

स्वास्थ्य के मोर्चे पर खासी प्रगति के बावजूद कोरोना वायरस से उपजी महामारी ने मानव प्रजाति को असहाय कर दिया है। दुनिया भर के दिग्गज दिन-रात इस बीमारी की दवा तलाशने में जुटे हुए हैं। जानलेवा कोरोना वायरस राजा और रंक या किसी देश अथवा धर्म का लिहाज नहीं करता। एक देश के बाद दूसरे देश में पैठ बनाकर इसने पूरी दुनिया को थर्रा दिया है। इससे खौफजदा तमाम देश अपनी सीमाएं बंद करके लॉकडाउन का एलान कर रहे हैं ताकि इसका प्रसार रोका जा सके। यह किसी दुःस्वप्न से कम नहीं कि जहां वर्ल्ड वाइड वेब यानी इंटरनेट ने दुनिया को खोलकर लोगों को आपस में जोड़ दिया था वहीं कोरोना वायरस ने देशों को सीमाएं बंद करने और अपनी जनता को शारीरिक दूरी का पालन करने पर मजबूर कर दिया है।
हम जब इस आपदा से उबरकर आर्थिक मंदी और व्यक्तिगत जीवन में उथलपुथल जैसी वास्तविकता से दो-चार होंगे तब कई सवाल उठेंगे जिनके केंद्र में यही होगा कि क्या ऐसी विपदाओं को रोका जा सकता है? विकास के हमारे प्रारूप पर भी प्रश्न उठेंगे। कुछ जानकार दलीलें भी दे रहे हैं कि अन्य प्रजातियों के पर्यावास को नष्ट करने की मानवीय तृष्णा ऐसी आपदाओं को आमंत्रण दे रही है। इस महामारी ने पारिस्थितिकीय असंतुलन के विषय को केंद्र में ला दिया है। पारिस्थितिकी में संतुलन की पुनस्थापना के लिए प्राचीन भारतीय दर्शन सबसे अहम कड़ी साबित हो सकता है। हमारे प्राचीन वैदिक साहित्य में सभी जीवित प्रजातियों को बराबर सम्मान देने के उदाहरण हैं। ऋग्वैदिक ऋचाओं में सभी के कल्याण की प्रार्थना की गई है। उनमें वनस्पति विशेषकर औषधीय गुणों वाले पौधों के बड़ी संख्या में उगने की कामना की गई है ताकि सभी बीमारियों की देखभाल के साथ हम स्वस्थ जीवन जी सकें। उनमें ईश्वर से विनती है कि सभी प्राणियों के हृदय में शांति का वास हो। उनमें प्रकृति को महत्ता एवं शांतिपूर्णसहअस्तित्व का प्राचीन भारतीय दर्शन प्रतिबिंबित होता है। पर्यावरणपारिस्थितिकीय संतुलन का संरक्षण हमारी प्राचीन परंपरा रही है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इसे लेकर उचित ही अनुभव किया था, ‘प्रकृति में सौंदर्यभाव और उसके लिए धार्मिक निहितार्थो को जोड़ने की दूरदर्शिता के लिए मैं अपने पूर्वजों के समक्ष शीश नवाता हूं।यह समय सभी भारतीयों और प्रत्येक वैश्विक नागरिक के लिए प्रकृति संरक्षण का सक्रिय योद्धा बनने का है ताकि पृथ्वी पर मनुष्य और सभी जीव-जंतु स्वस्थ रहकर सौहार्दपूर्ण सह-अस्तित्व का आनंद ले सकें। हम जिस हवा में सांस लेते हैं और जो पानी पीते हैं, वे साफ होने चाहिए। हमें मिट्टी, पौधे और अन्य प्राकृतिक संसाधनों को सहेजना चाहिए। लॉकडाउन के चलते हवा की गुणवत्ता में चमत्कारिक सुधार और शहरी इलाकों में वन्यजीवों के विचरण की खबरें यही दर्शाती हैं कि मानव ने प्रकृति में किस हद तक हस्तक्षेप किया है। हमारे ग्रंथों में उल्लिखित मंत्रों में पृथ्वी, आकाश एवं अंतरिक्ष के अलावा जल, वनस्पति, देवताओं, अवचेतन एवं बाहरी संसार यानी सभी के लिए शांति की कामना की गई है। स्वतंत्रता के बाद से भारत ने स्वास्थ्य से जुड़े विभिन्न सूचकांकों में खासी प्रगति की है। इस दौरान हमें स्मॉल पॉक्स जैसी कई संक्रामक बीमारियों के अलावा । पोलियो के उन्मूलन में सफलता मिली। भारत में औसत जीवन प्रत्याशा बढ़कर 69 वर्ष हो गई है। 1990 से 2016 के दौरान संक्रामक, मातृ, नवजात शिशु और पोषण संबंधी बीमारियों में भारत का बोझ 61 प्रतिशत से हल्का होकर 33 प्रतिशत रह गया है।
हालांकि बीते कुछ समय से जीवनशैली में हुए परिवर्तन के कारण गैर-संक्रामक रोगों में भारी बढ़ोतरी हुई है। कुछ साल पहले डब्ल्यूएचओ ने भारत में होने वाली मौतों में 61 प्रतिशत के लिए हृदय रोग, कैंसर और मधुमेह आदि को जिम्मेदार बताया था। इस खतरनाक रुझान को पलटने की दरकार है। इसके लिए खानपान में बदलाव लाकर स्वस्थ जीवनचर्या अपनाने को प्रोत्साहन देने वाला राष्ट्रव्यापी जागरूकता अभियान चलाया जाए। युवावस्था से ही स्वस्थ खानपान, योग और ध्यान की आदतें डलवानी होंगी। ये पहलू स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाए जाएं। इसके साथ ही इंडियन मेडिकल एसोसिएशन और अन्य संस्थानों को जागरूकता का प्रसार करना चाहिए। मीडिया को भी जन-जन तक सूचनाएं पहुंचाने में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। एक और अहम मसला है वृद्धों की खास देखभाल की आवश्यकता का।
 

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कोविड-19 से बचाव 

देश के शहरी-ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे में भारी अंतर को देखते हुए कोविड-19 ने इसमें निवेश की आवश्यकता को पुन: रेखांकित किया है। हालांकि आयुष्मान भारत जैसी योजना ने इस समस्या को कुछ हद सुलझाया है जिसके तहत पचास करोड़ लोगों को स्वास्थ्य बीमा के साथ ही 1.5 लाख स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से व्यापक स्वास्थ्य सेवाएं दी जा रही हैं। फिर भी हमें बीमारी की रोकथाम और उसके उपचार जैसे स्वास्थ्य के दोनों पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए। हमें जीवनशैली से जुड़े मसलों को साधकर व्यापक समाधान तलाशने की दिशा में जुटना होगा। यह समझना भी आवश्यक है कि हम पृथ्वी को वनस्पति और पशु-पक्षियों के साथ साझा करते हैं। इस जुड़ाव को समझने के साथ ही डब्ल्यूएचओ की वन हेल्थकी उस अवधारणा को भी आत्मसात करने की दरकार है जिसमें मनुष्य, प्राणी, वनस्पति और पर्यावरण की सेहत के लिए बहुस्तरीय दृष्टिकोण अपनाने की बात है। इसे संभव बनाने के लिए विभिन्न क्षेत्रों को साथ लाने के साथ ही विविध विशेषज्ञों को एकजुट कर नीतियां और कार्यक्रम तैयार करने होंगे। हमारी दुनिया परस्पर निर्भर है। हमें इसे संतुलित करना ही होगा ताकि हम स्वस्थ जीवन जी सकें। हमें एकजुट होकर पृथ्वी को सुरक्षित बनाना होगा जिसमें पर्यावरण संरक्षण के साथ ही मानव, वनस्पति और जीव-जंतुओं सभी की सेहत सुधर सके।

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