Daily Current 06 April 2020

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DCADaily Current 06 April 2020

Current Affairs for ssc, Bank, Railway Exam
Daily Current Affairs

INTERNATIONAL

1.आईएमएफ ने कहा-अब हम मंदी में हैं, यह वैश्विक वित्तीय संकट से भी बदतर, संयुक्त राष्ट्र ने भी चेताया
?  अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की मैनेजिंग डायरेक्टर क्रिस्टालिना जॉजीर्वा ने साल 2008 में आए वैश्विक वित्तीय संकट से बदतर मंदी को लेकर चेतावनी दी है।
?  समाचार एजेंसी सिन्हुआ ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के साथ एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में जॉजीर्वा के बयान के हवाले से कहा, “अब हम मंदी में हैं, यह वैश्विक वित्तीय संकट से भी बदतर है।” वहीं संयुक्त राष्ट्र ने भी ऐसी ही बात कही है।
?  संयुक्त राष्ट्र आर्थिक आयोग के कार्यकारी सचिव और लैटिन अमेरिका और कैरिबियन (CEPAL) के कार्यकारी सचिव एलिसिया बारसेना ने कहा कि लैटिन अमेरिका 2020 में एक गहरी मंदी की ओर बढ़ रहा है। कोरोनोवायरस महामारी के कारण इस क्षेत्र की जीडीपी में 1.8 से 4.0 प्रतिशत की गिरावट होगी।
?  आईएमएफ की मैनेजिंग डायरेक्टर ने स्वास्थ्य और आर्थिक जैसे ‘दोहरे संकट’ पर बात करते हुए कहा कि कोविड-19 के बढ़ते प्रकोप के चलते ऐसा आईएमएफ के इतिहास में अभूतपूर्व है।
?  जॉजीर्वा ने जोर देकर कहा कि दुनियाभर में कोविड-19 से लड़ाई के बीच जीवन बचाने और आजीविका की रक्षा पर साथ में काम किए जाने की आवश्यकता है।बता दें देश में कोरोना वायरस के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।
?  राज्यों में संक्रमण के 500 से ज्यादा मामले सामने आने के साथ ही संक्रमित लोगों की संख्या 3,000 पार कर गई है और 90 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है।
?  वहीं वर्डोमीटर के मुताबिक दुनिया में कोरोना से 1,098,848 लोग संक्रमित हैं, जिनमें 226,106 मरीज ठीक हो चुके हैं। वहीं 58871 लोगों की मौत हो चुकी है।
2. अमेरिका के खिलाफ रूस की कूटनीतिक चाल से गिरा है क्रूड, इसलिए उत्पादन कटौती का समझौता होने और भाव में जल्द सुधार के आसार नहीं
?  कच्चे तेल के भाव में जल्द तेजी आने के आसार नहीं दिख रहे। क्योंकि ताजा घटनाक्रम इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि क्रूड के भाव के गिरकर 18 साल के निचले स्तर पर आ जाने का मूल कारण प्राइस वार नहीं बल्कि प्राइस वार के बहाने अमेरिका को झुकाने का है। रूस ने संकेत दिया है कि वह वेनेजुएला की राजनीति में अमेरिका के हस्तक्षेप से नाराज है और वह वेनेजुएला के साथ तेल सहयोग पर कायम है।
?  समीकरण इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि जब तक अमेरिका वेनेजुएला के तेल संपत्तियों पर से पाबंदी नहीं हटा लेता, तब तक रूस क्रूड के भाव में बढ़ोतरी नहीं होने देगा और इसलिए वह तब तक उत्पादन कटौती के लिए सऊदी अरब से समझौता भी नहीं करेगा।
तेल का भाव गिरने के बाद बचाव की मुद्रा में दिख रहा है अमेरिका
?  तेल का भाव कम रहने से सबसे ज्यादा नुकसान अमेरिकी कंपनियों को हो रहा है और कई अमेरिकी कंपनियों के कंगाल हो जाने की आशंका पैदा हो गई है। इसलिए अमेरिका क्रूड आयात पर शुल्क लगाने के विकल्प पर भी विचार कर रहा है। इससे स्पष्ट दिख रहा है कि अमेरिका बचाव की मुद्रा में आ गया है।
?  हाल में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब और रूस के बीच प्राइस वार को खत्म करने की कोशिशें भी की हैं। लेकिन अमेरिकी मध्यस्थता से सऊदी अरब और रूस के बीच उत्पादन कटौती का समझौता हो जाने की उम्मीद में कच्चे तेल के भाव में जो तेजी दिखी है, वह अधिक समय तक टिक पाने की उम्मीद नहीं है।
?  ट्रंप ने अमेरिका में क्रूड के आयात पर शुल्क लगाने का जो संकेत दे दिया है, उससे दुनिया के अन्य हिस्से में कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ जाएगी। कोरोनावायरस के कारण दुनियाभर में कच्चे तेल की मांग घटी हुई है। ऐसे में तेल की आपूर्ति बढ़ने से समीकरण और खराब होगा और कच्चे तेल के भाव में और गिरावट आ सकती है।
वेनेजुएला में अमेरिकी दखलंदाजी के खिलाफ है रूस
?  वेनेजुएला में रूस के एंबेसेडर सर्गेई मेलिक बग्दासरोव ने एक साक्षात्कार में कहा कि मुद्दा तेल उत्पादन ज्यादा होने का नहीं है, बल्कि वेनेजुएला के तेल निर्यात पर अमेरिका की ओर से लगाए गए शर्मनाक प्रतिबंध का है।
?  यह पाबंदी कोरोनावायरस की महामारी का बिना कोई खयाल रखे लगाई गई है। जबकि जंगल में भी यह अलिखित नियम होता है कि सूखे के दिनों में जलाशयों के आसपास एक जानवर दूसरे जानवरों पर हमला नहीं करते।
?  वेनेजुएला एंगल का पता इस बात से भी चलता है कि गुरुवार को वेनेजुएला के लिए अमेरिका के विशेष प्रतिनिधि इलियट अब्राम्स ने कहा था कि वेनेजुएला के मामले में अमेरिका रूस से संपर्क बनाए हुए है।
वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोला मदुरो को हटाकर दूसरी सरकार बनाना चाहता है अमेरिका
?  वेनेजुएला में राष्ट्रपति निकोला मदुरो की सरकार को हटाकर अमेरिका एक अंतरिम सरकार बनाना चाहता है, जिसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के सदस्य हों। अपनी बात मनवाने के लिए अमेरिका ने वेनेजुएला पर प्रतिबंध लगा रखा है।
?  जनवरी में वेनेजुएला के विपक्षी नेता जुआन गुइडो ने खुद को राष्ट्रपति घोषित कर दिया था। अमेरिका व कई अन्य देशों ने उसका समर्थन किया है और अमेरिका ने वर्तमान राष्ट्रपति निकोला मदुरो से इस्तीफा देने की मांग की है।
?  इसके साथ ही अमेरिका ने वेनेजुएला के कई अधिकारियों पर पाबंदियां भी लगा दी। अमेरिका ने वेनेजुएला की राष्ट्रीय तेल कंपनी पीडीवीएसए और उसकी सहयोगी कंपनियों की 7 अरब डॉलर की संपत्तियां भी ब्लॉक कर दी। दूसरी तरफ मौजूदा राष्ट्रपति मदुरा को रूस और चीन सहित कई अन्य देशों का समर्थन हासिल है।
क्रूड में पहले से चल रही गिरावट का रूस ने अपने हिसाब से लाभ उठाया
?  सभी स्थितियों को देखने पर ऐसा लगता है कि कोरोनावायरस के कारण मांग घटने से क्रूड में पहले से ही चल रही गिरावट का रूस ने अमेरिका को झुकाने के लिए लाभ उठाया।
?  कोरोनावायरस के कारण मांग घटने से क्रूड करीब 70 डॉलर से गिरकर 6 मार्च को करीब 45 डॉलर का रह गया था। इसी वक्त उत्पादन को लेकर ओपेक, रूस व अन्य तेल उत्पादक देशों का पुराना समझौता मार्च के आखिर में एक्सपायर कर रहा था।
?  इस बीच मार्च के बाद के लिए तेल उत्पादक देशों में फिर से बैठक हुई। माना जा रहा था कि ये देश उत्पादन घटाकर कीमत बढ़ाने का फैसला करेंगे। लेकिन रूस ने भांप लिया कि यदि वह उत्पादन नहीं घटाता, तो तेल कीमत और गिरेगी और अमेरिका की शेल ऑयल कंपनियों का दिवाला निकल जाएगा। इससे अमेरिका दबाव में आएगा।
रूस का पैंतरा काम कर गया, 45 से गिरकर 22 डॉलर तक आया बॅट क्रूड
?  ओपेक प्लस की बैठक में रूस ने कीमत सुधारने के लिए उत्पादन घटाने से इन्कार कर दिया। इसके बाद सऊदी अरब की तरफ से प्राइस वार शुरू हो गया और 9 मार्च को बेंट क्रूड करीब 45 डॉलर से गिरकर करीब 34 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। यह बाद में और गिरते हए 31 मार्च को करीब 22 डॉलर पर आ गया।
?  कोरोनावायरस के कारण रूस को इससे अच्छा मौका फिर शायद कभी नहीं मिलता। अमेरिकी कंपनियों के नुकसान से रूस के साथ सऊदी अरब को भी फायदा होना तय है। शैल कंपनियों के कारण अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा क्रूड उत्पादक देश बन बैठा है। इससे सऊदी अरब और रूस की दादागिरी क्रूड के अंतरराष्ट्रीय बाजार में घटी है।
?  माना जा रहा है कि क्रूड के भाव में गिरावट के कारण अमेरिका की कई क्रूड कंपनियां दिवालिया हो जाएंगी। इससे क्रूड के अंतरराष्ट्रीय बाजार में सऊदी अरब और रूस को अपनी पुरानी दादागिरी को बरकरार रखने तथा बाजार हिस्सेदारी को और बढ़ाने का अवसर मिल जाएगा।
अमेरिका में क्रूड पर आयात शुल्क लगने से और गिरेगा क्रूड का अंतरराष्ट्रीय भाव
?  इस बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को व्हाइट हाउस की ओर से जारी किए गए एक बयान में कहा कि यदि जरूरी हुआ तो अमेरिका के एनर्जी सेक्टर को और उसके कामगारों का रोजगार बचाने के लिए वह क्रूड के आयात पर शुल्क लगाएंगे।
?  ट्रंप ने शुक्रवार को अमेरिकी तेल कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एक बैठक में ताजा हालत का जायजा लिया था। तेल कीमतों में भारी गिरावट से अमेरिकी तेल कंपनियां काफी बुरे दौर से गुजर रही हैं।
अमेरिका की कई कंपनियां ग्राहकों को क्रूड ले जाने के लिए दे रही हैं पैसा
?  अमेरिका मे क्रूड की कई श्रेणियों के भाव 10 डॉलर प्रति बैरल से नीचे चल रहे हैं। कुछ क्रूड के भाव तो शून्य से भी नीचे आ गए हैं। इसका मतलब यह है कि उन क्रूड को रखने के लिए कंपनियों के पास जगह नहीं बची है। इसलिए संबंधित कंपनियां खरीदार को मुफ्त में भी क्रूड दे रही हैं और उन्हें क्रूड ले जाने के लिए अतिरिक्त पैसे भी दे रही हैं।
?  आयात शुल्क एक ऐसे टूल होता है, जिससे देश में संबंधित कमोडिटी की खपत और आयात को हतोत्साहित किया जाता है।
?  अमेरिका यदि क्रूड के आयात पर शुल्क लगाने का फैसला करता है, तो ओपेक सदस्य देशों और रूस के क्रूड की मांग अमेरिका में और घट जाएगी, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में इनके क्रूड की आपूर्ति और बढ़ जाएगी। इससे क्रूड की अंतरराष्ट्रीय कीमत और गिरेगी।
उत्पादन कटौती पर सहमति नहीं बनने से 10 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे गिर सकता है क्रूड का भाव
?  ऑयल प्राइस डॉट कॉम की एक रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब और रूस के बीच यदि तेल उत्पादन घटाने पर सहमति नहीं बनी तो क्रूड का भाव 10 डॉलर प्रति बैरल के भी नीचे गिर सकता है।
?  रिपोर्ट में कहा गया है कि बाजार में दिख रहा उतार-चढ़ाव, बाजार हिस्सेदारी के लिए विभिन्नन देशों में जंग, अमेरिका द्वारा सुझाई गई उत्पादन कटौती को अमल में लाने की अक्षमता और कोरोनावायरस के कारण मांग में गिरावट कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिनका समाधान बैठक में नहीं किया जा सकता है।
?  पिछले दिनों अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ट्वीट में कहा था कि सऊदी अरब और रूस उत्पादन में 1 करोड़ बैरल रोजाना से ज्यादा की कटौती के लिए तैयार हो सकते हैं।
2 करोड़ बैरल रोजाना की घट चुकी है मांग, सिर्फ 1 करोड़ बैरल की उत्पादन कटौती काफी नहीं होगी
?  विभिन्न अनुमानों के मुताबिक दुनियाभर में कोरोनावायरस संक्रमण से कारोबारी गतिविधियां बंद होने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में 2 करोड़ बैरल रोजाना से ज्यादा की मांग घटी हुई है। संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए करीब आधी दुनिया में लॉकडाउन चल रहा है। इसलिए 1 करोड़ । बैरल रोजाना की कटौती से कीमत नहीं सुधरने वाली है। उल्टे इतनी कटौती से बाजार में नकारात्मक प्रतिक्रिया ही दिखेगी।
?  यदि इस कटौती से तेल की कीमत स्थायी तौर पर नहीं सुधरी, तो बाजार में भय का माहौल ऐतिहासिक उच्च स्तर तक पहुंच सकता है और इससे क्रूड | की कीमत आने वाले सप्ताह में गिरकर 10 डॉलर प्रति बैरल से नीचे भी जा सकती है।
कोरोनावायरस और प्राइस वार से 18 साल के निचले स्तर तक गिर चुका है क्रूड
?  कोरोनावायरस के कारण कच्चे तेल का भाव में हाल में काफी गिरावट देखी गई है। ओपेक और रूस के बीच उत्पादन कटौती का समझौता नहीं हो पाने और प्राइस वार शुरू हो जाने के कारण क्रूड में और गिरावट आई और इसने 31 मार्च को करीब 18 साल का निचला स्तर (करीब 22 डॉलर प्रति बैरल) को छू लिया था।
?  हालांकि ओपेक, रूस व अन्य क्रूड उत्पादक देशों के बीच उत्पादन कटौती पर कोई समझौता हो जाने की उम्मीद से पिछले कुछ दिनों में क्रूड का भाव चढ़ा है। बेंट क्रूड शुक्रवार को करीब 34 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हआ।

NATIONAL

3.खनन कानून में संशोधन, कई कामों को अब नहीं लेनी होगी हरित मंजूरी
?  केंद्र सरकार ने खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम में संशोधन करते हुए कई कार्यो के लिए हरित मंजूरी लेने की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया है। उदाहरण के तौर पर नदी में बाढ़ आने के बाद खेतों में जमा बालू या सिल्ट को हटाने के लिए अब पर्यावरणीय मंजूरी लेने की जरूरत नहीं होगी।
?  पर्यावरण मंत्रलय की अधिसूचना के अनुसार, ‘कुम्हारों को अब बर्तन बनाने के लिए सामान्य मिट्टी की हाथ से खोदाई को पर्यावरणीय मंजूरी नहीं । लेनी होगी। इसी प्रकार ईंट निर्माण के लिए हाथ से मिट्टी की खोदाई भी बिना हरित मंजूरी के की जा सकती है।।
?  खनन कानून में संशोधन करते हुए मंत्रलय ने कहा, ‘लोगों ने पर्यावरण, वन । एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रलय से सड़क निर्माण कार्य में मिट्टी की खोदाई के लिए पर्यावरणीय मंजूरी की अनिवार्यता को खत्म करने का आग्रह किया था। इसी प्रकार पारंपरिक कार्यों से जुड़े समुदायों ने भी मिट्टी की खोदाई के लिए नियम में छूट देने की मांग की थी।’
?  मंत्रालय के अनुसार, ‘तालाब, डैम, जलाशय, नदी व तालाब से सिल्ट हटाने, ग्रामीण सड़क निर्माण व मनरेगा के तहत तालाब की खोदाई के लिए अब हरित मंजूरी की जरूरत नहीं होगी।
?  इसी प्रकार पेयजल के लिए कुएं की खोदाई अथवा जिलाधिकारी या अन्य सक्षम प्राधिकारी के आदेश पर बाढ़ आदि से निपटने के लिए नहर, नाला, नाली या अन्य जलाशय के निर्माण के लिए पूर्व में हरित मंजूरी की जरूरत नहीं होगी। इसके अलावा राज्य सरकार ने जिन कार्यों को गैर खनन गतिविधि के तौर पर घोषित किया हो, उनके लिए भी पर्यावरणीय अनुमति की जरूरत नहीं है।’

ECONOMY

4. ज्यादा उधारी जुटा सकते हैं राज्य
?  कोरोना महामारी के कारण पैदा हुई असाधारण परिस्थिति के मद्देनजर केंद्र ने राज्यों को वित्त वर्ष 2020-21 में अपनी कुल उधारी जरूरतों का 50 फीसदी तक अप्रैल में ही लेने की अनुमति दे दी है। बिजनेस स्टैंडर्ड को सूत्रों से यह जानकारी मिली है।
?  घटते राजस्व के कारण केंद्र के पास भी संसाधनों की कमी हो गई है  जिसके कारण ऐसा कदम उठाना जरूरी हो गया था।
?  संसाधनों की कमी के कारण केंद्र विभिन्न मदों में राज्यों के बकाये का भुगतान नहीं कर पा रहा है। इसमें केंद्रीय करों में राज्यों का हिस्सा, वस्तु । एवं सेवा कर मुआवजा और अन्य अनुदान शामिल हैं। साथ ही विभिन्न राज्य वित्तीय पैकेज मांग रहे हैंए लेकिन केंद्र के पास इसके लिए संसाधनों की कमी है।
?  एक शीर्ष सरकारी अधिकारी ने कहा, ‘राज्यों को 2020-21 के लिए उनकी उधारी सीमा का 50 फीसदी तक हिस्सा अप्रैल में उधार लेने की अनुमति दे दी गई है। अगर वे अपनी कुल उधारी का आधा हिस्सा अग्रिम लेना चाहते हैं तो ऐसा कर सकते हैं।’ उन्होंने साथ ही कहा कि अगर भविष्य में जरूरत पड़ी तो केंद्र राज्यों के लिए कुल उधारी सीमा में छूट देने पर भी विचार करेगा।
?  भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने 31 मार्च को राज्यों के लिए अप्रैल-जून के लिए सांकेतिक उधारी कैलेंडर और केंद्र के लिए अप्रैल-सितंबर का कैलेंडर जारी किया था। लेकिन उससे पहले ही केंद्र ने राज्यों को यह अनुमति दे दी थी। अधिकारी ने कहा कि 50 फीसदी की सीमा के भीतर राज्य कितना उधार लेना चाहते हैं। यह राज्यों और आरबीआई पर छोड़ दिया गया है। उन्होंने कहा, ‘हर राज्य आरबीआई के साथ चर्चा के बाद यह फैसला करेगा कि उसे कितना उधार लेना है। भविष्य में ब्याज भुगतान में कितनी देनदारी चाहते हैंए बॉन्ड बाजार में उनकी प्रतिभूतियों की कितनी मांग है।’ सामान्य स्थिति में राज्यों की राजकोषीय सीमाओं से भी उनकी उधार लेने की क्षमता का निर्धारण होता है। राजकोषीय दायित्व एवं बजट प्रबंधन की सीमाएं अब भी लागू हैं लेकिन केंद्र और राज्यों के अधिकारियों का कहना है कि यह सामान्य समय नहीं है।
?  आरबीआई द्वारा अप्रैल-जून तिमाही के लिए जारी राज्यों के सांकेतिक कैलेंडर के मुताबिक राज्यों के इस अवधि में 1.27 लाख करोड़ रुपये उधार लेने का अनुमान है। इसमें से करीब 55,225 करोड़ रुपये की उधारी अप्रैल में लिए जाने की उम्मीद है।
?  इस तरह यह तिमाही के कुल अनुमान को पार कर जाएगी। अधिकारी ने कहा कि आरबीआई के मुताबिक यह सांकेतिक कैलेंडर है। अमूमन राज्यों के अनुरोध पर केंद्रीय बैंक का रुख उदार होता है। इसलिए वे ज्यादा उधार ले सकते हैं।
?  हालांकि इस बारे में कोई आधिकारिक अनुमान मौजूद नहीं है कि राज्य वित्त वर्ष 2021 में कुल कितना उधार लेंगे क्योंकि सभी राज्यों ने अभी बजट पेश नहीं किया है। भारतीय स्टेट बैंक के अर्थशास्त्री सौम्य कांति घोष के मुताबिक यह राशि 7 लाख करोड़ रुपये हो सकती है।
?  उन्होंने कहा, ‘वित्त वर्ष 2020 में कुल उधारी 6.40 लाख करोड़ रुपये थी। मौजूदा असाधारण स्थिति को देखते हुए इस साल राज्यों की कुल उधारी इससे अधिक रह सकती है। हर साल सामान्य स्थिति में राज्यों की सकल उधारी में 10 फीसदी का इजाफा होता है। अगर हम इसके आधार पर देखें तो इस बार यह आंकड़ा 7 लाख करोड़ रुपये रह सकता है।
?  घोष के अनुमान को मानें तो अगर राज्य अपने पूरे साल की जरूरत का 50 फीसदी अप्रैल में लें तो यह राशि 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो सकती है। केंद्र ने इस महीने 79,000 करोड़ रुपये की राशि उधार लेने की योजना बनाई है। इस तरह अप्रैल में सरकार कुल 3.8 लाख करोड़ रुपये उधार ले सकती है जिससे प्रतिफल पर भारी असर हो सकता है।
5. लॉकडाउन का अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव दिखेगा: सर्वेक्षण
?  कोरोनावायरस (कोविड-19) के फैलने और उसकी रोकथाम के लिए देशव्यापी लॉकडाउन का घरेलू अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव दिखेगा। अधिकतर कंपनियों ने आशंका जताई है कि चालू और पिछली तिमाही में उनके राजस्व और मुनाफे में उल्लेखनीय गिरावट आ सकती है। भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) द्वारा किए गए सीईओ स्नैप पोल से यह खुलासा हुआ है। सर्वेक्षण में लॉकडाउन के कारण मांग में गिरावट और रोजगार प्रभावित होने की आशंका जताई गई है।
?  इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से किए गए इस सर्वेक्षण में देश भर के विभिन्न क्षेत्रों के करीब 200 सीईओ ने भाग लिया। सर्वेक्षण में शामिल अधिकतर सीईओ ने आशंका जताई कि चालू तिमाही (अप्रैल से जून 2020) और पिछली तिमाही (जनवरी से मार्च 2020) के लिए राजस्व में 10 फीसदी से अधिक और मुनाफे में 5 फीसदी से अधिक की गिरावट दिख सकती है। घरेलू कंपनियों के राजस्व और मुनाफे में इस भारी गिरावट से जीडीपी वृद्धि पर उल्लेखनीय प्रभाव पड़ सकता है।
?  इसके अलावा अधिकतर कंपनियों (80 फीसदी) कंपनियों ने दावा किया कि उनकी इन्वेंटरी फिलहाल बेकार पड़ी है। हालांकि 40 फीसदी से अधिक कंपनियों ने उम्मीद जताई कि लॉकडाउन समाप्त होने के बाद उनका स्टॉक एक महीने से अधिक समय तक चलेगा। इससे पता चलता है कि लॉकडाउन अवधि के बाद कंपनियों को मांग में कमी बने रहने के आसार दिख रहे हैं।
?  लॉकडाउन के दौरान आवश्यक वस्तुओं एवं उत्पादों के उत्पादन एवं आपूर्ति करने वाली अधिकतर कंपनियों को आवश्यक वस्तुओं एवं सेवाओं की आपूर्ति में व्यवधान से जूझना पड़ रहा है।
?  कंपनियों ने कहा कि श्रमिकों का अभाव और उत्पादों की आवाजाही में व्यवधान एक प्रमुख समस्या बनकर उभरी है। चाहे आवश्यक वस्तुओं का विनिर्माण हो अथवा गोदाम में भंडारण एवं परिवहन अथवा खुदरा बिक्री, हर मोर्चे पर ऐसी समस्याएं दिख रही हैं। हालांकि सरकार ने आवश्यक वस्तुओं के विनिर्माण, परिवहन एवं वितरण की अनुमति दी है लेकिन स्थानीय स्तर पर आवश्यक वस्तुओं एवं सेवाओं पर भी लॉकडाउन का असर दिख रहा है।
?  रोजगार के मोर्चे पर करीब 52 फीसदी कंपनियों को कोविड-19 के प्रकोप और लॉकडाउन के कारण अपने संबंधित क्षेत्रों में रोजगार के नुकसान की आशंका दिख रही है। सीआईआई ने कहा कि जिस अनुपात में छंटनी की आशंका जताई जा रही है वह काफी चौंकाने वाली है।
?  करीब 47 फीसदी कंपनियों ने कहा कि करीब 15 फीसदी छंटनी होने के आसार हैं। हालांकि चिंता की बात यह है कि 32 फीसदी कंपनियों ने उम्मीद जताई कि लॉकडाउन खत्म होने के बाद 15 से 30 फीसदी के दायरे में छंटनी हो सकती है।
6. रघुराम राजन ने कहा, सबसे बड़े आर्थिक संकट के दौर में है भारत, सरकार विपक्ष, विशेषज्ञों की भी मदद ले
?  रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर एवं अर्थशास्त्री रघुराम राजन ने कोरोना वायरस के कारण उपस्थित चुनौतियों के मद्देनजर कहा कि देश आर्थिक लिहाज से आजादी के बाद के सबसे आपातकालीन दौर में है। उन्होंने कहा कि सरकार को इससे निकलने के लिये विपक्षी दलों समेत विशेषज्ञों की मदद लेनी चाहिये।
?  राजन ने ‘हालिया समय में संभवत: भारत की सबसे बड़ी चुनौती शीर्षक से एक ब्लॉग पोस्ट में यह टिप्पणी की। उन्होंने कहा, “यह आर्थिक लिहाज से संभवत: आजादी के बाद की सबसे बड़ी आपात स्थिति है। ‘2008-09 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान मांग में भारी कमी आयी थी, लेकिन तब हमारे कामगार काम पर जा रहे थे, हमारी कंपनियां सालों की ठोस वृद्धि के कारण मजबूत थीं, हमारी वित्तीय प्रणाली बेहतर स्थिति में थी और सरकार के वित्तीय संसाधन भी अच्छे हालात में थे। अभी जब हम कोरोना वायरस महामारी से जूझ रहे हैं, इनमें से कुछ भी सही नहीं हैं। हालांकि उन्होंने कहा कि यदि उचित तरीके तथा प्राथमिकता के साथ काम किया जाये तो भारत के पास ताकत के इतने स्रोत हैं कि वह महामारी से न सिर्फ उबर सकता है बल्कि भविष्य के लिये ठोस बुनियाद भी तैयार कर सकता है। राजन ने कहा कि सारे काम प्रधानमंत्री कार्यालय से नियंत्रित होने से ज्यादा फायदा नहीं होगा क्यों कि वहां लागों पर पहले से काम का बोझ ज्यादा है।
?  उन्होंने कहा, “अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है। सरकार को उन लोगों को बुलाना चाहिये जिनके पास साबित अनुभव और क्षमता है। भारत में ऐसे कई लोग हैं जो सरकार को इससे उबरने में मदद कर सकते हैं। सरकार राजनीतिक विभाजन की रेखा को लांघ कर विपक्ष से भी मदद ले सकती है, जिसके पास पिछले वैश्विक वित्तीय संकट से देश को निकालने है।
?  पूर्व आरबीआई गवर्नर ने कहा कि कोविड-19 के प्रकोप से निकलने के लिये हमारी त्वरित प्राथमिकता व्यापक जांच, एक-दूसरे से दूरी तथा कठोर क्वारंटीन (पृथकीकरण) के जरिये संक्रमण के प्रसार की रोकथाम होनी चाहिये।
?  उन्होंने कहा, “21 दिनों का लॉकडाउन (बंद) पहला कदम है। इससे हमें बेहतर तैयारी करने का समय मिला है। सरकार हमारे साहसी चिकित्सा कर्मियों के सहारे लड़ रही है और जनता, निजी क्षेत्र, रक्षा क्षेत्र, सेवानिवृत्त लोगों समेत हरसंभव संसाधन का इस्तेमाल करने की तैयारी में है। हालांकि सरकार को गति कई गुणा तेज करने की जरूरत है।
?  राजन ने कहा कि हम लंबे समय तक लॉकडाउन नहीं सह सकते हैं। ऐसे में हमें इस बात पर विचार करना होगा कि किस तरह से संक्रमण को सीमित रखते हुए आर्थिक गतिविधियों को पुन: शुरू करें। उन्होंने कहा, “भारत को अब इस बारे में भी योजना तैयार करने की जरूरत है कि लॉकडाउन के बाद भी वायरस पर काबू नहीं पाया जा सका तब क्या किया जाएगा।”

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